सरगुजा / सीतापुर – सरगुजा जिले के सीतापुर में बहुचर्चित हत्याकांड के बारे में सुना ही होगा जिसमें एक ठेकेदार ने आदिवासी मजदूर संदीप लकड़ा की हत्या कर दी थी फिर लाश को मैनपाट में दफना कर उसके ऊपर पानी टंकी बना दिया था ..मामले में ठेकेदार ने अपने पैसे के दम पर पुलिस को कार्यवाही करने महीनों लगवा दिए ..इसी तरह का मामला एक बार सीतापुर ब्लॉक के ग्राम बगडोली में हुआ है जहां ठेकेदार जिशान इराकी ने एक आदिवासी नाबालिग छात्र की जान ले ली है .. बगडोली गांव के ग्रामीणों का कहना है कि मृतक छात्र नकुल सिंह जब स्कूल जा रहा था तो छात्र को जबरन बिजली मोटर पंप चालू करने ठेकेदार जिशान इराकी ने कहा और आदिवासी छात्र की करेंट से दर्दनाक मौत हो गई ग्रामीणों के मुताबिक गांव में निर्माणाधीन सामुदायिक भवन के काम के दौरान ठेकेदार जिशान इराकी ने नाबालिग आदिवासी छात्र नकुल सिंह को जबरन बिजली मोटर पंप चालू करने के लिए कहा। इसी दौरान करेंट लगने से छात्र की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई।

ग्रामीणों का कहना है कि मृतक नकुल गरीब परिवार से था। पिता की मौत पहले ही हो चुकी थी और वह अपनी मां व बहन का इकलौता सहारा था। ठेकेदार द्वारा गरीब परिवार को न्याय दिलाने के बजाय गुमराह करने का आरोप है। बताया जा रहा है कि मृतक की मां को 20 हजार रुपए देकर मामले को दबाने की कोशिश की गई, साथ ही लाखों रुपए देने का आश्वासन भी दिया गया।
ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार अपने रसूख और पैसों के दम पर पुलिस कार्यवाही को दबा रहा है। वहीं, सीतापुर पुलिस पर भी केवल खाना-पूर्ति का आरोप लग रहा है।
इस मामले में पूर्व मंत्री और सीतापुर विधानसभा के पूर्व विधायक अमरजीत भगत की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि जब वह आदिवासी मजदूर संदीप लकड़ा हत्याकांड में न्याय की लड़ाई का हिस्सा बने थे, तो अब आदिवासी छात्र की मौत पर क्यों चुप हैं? पूर्व मंत्री प्रतिनिधि बदरूद्दीन इराकी के रिश्तेदार ठेकेदार जिशान इराकी की वजह से अमरजीत भगत नहीं पहुंच रहे पीड़ित परिवार के पास ,,हालही में आदिवासी समाज की युवती के साथ छेड़छाड़ में थाना पहुंचकर पुलिस कर्मियों को कार्यवाही करने लगाई थी फटकार ,,आदिवासी छात्र की मौत पर क्यो नहीं पहुंच रहे न्याय दिलाने..
गांव के लोग आरोप लगा रहे हैं कि ठेकेदार जिशान इराकी के राजनीतिक संबंधों और दबाव के चलते मृतक की मां को दबंगों द्वारा बंधक बनाकर न्याय की आवाज उठाने से रोका जा रहा है।

फिलहाल, सवाल यह है कि क्या एक गरीब आदिवासी मां को बेटे की मौत पर न्याय मिलेगा या फिर ठेकेदार का पैसा और राजनीतिक दबाव भारी पड़ जाएगा।

